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29 June, 2007

बड़े बे-आबरू हुए हम

अपने ही घर के दरवाजे पर
बड़े बे-आबरू हुए हम
यूं ही खड़े रहे दर पर
मगर किसको मेरी फिकर
लोग आते रहे जाते रहे
मेरी ओर देख मुस्कुराते रहे
हर नजर मुझसे कहती रही
अजनबी हो चुके हैं तेरे कदम
बड़े बे-आबरू हुए हम
जहां कभी हम चहकते थे
दिल खोलकर हंसते थे
घंटों बातें होती थीं
बेझिझक मुलाकातें होती थीं
वो जगह इतनी परायी हो गई
इक सांस लेने में निकलता है दम
बड़े बे-आबरू हुए हम
मैंने तो बस एक ख्वाब देखा था
उसे सच करने की हिम्मत जुटाई थी
इसीलिए तो घर से निकला था
आपने दिल में रख लिए
सारे गम
बड़े बे-आबरू हुए हम
अपने ही घर के दरवाजे पर
बड़े बे-आबरू हुए हम