जब तुम मेरी उमर के हो जाओगे
तब ये बात समझ पाओगे
कि जज्बात कैसे काम करते हैं
कि हालात क्यों ऐसे बन जाते हैं
जब देखोगे कि तुम्हारे ख्वाबों की उम्र हो चली है
जो बड़ी हुईं, जवान हुईं और अब ढलने लगी हैं
जिन्हें बड़े प्यार से संजोया था
इत्मिनान से पाला था, पोसा था
वो सपने अब सफेद होने लगे हैं
उन ख्वाबों की उड़ती रंगत को
तब तुम थाम नहीं पाओगे
जब तुम मेरी उमर के हो जाओगे
तब ये बात समझ पाओगे
कि बेवजह वक्त गुजरना क्या होता है
हंसते हुए जार-जार रोना क्या होता है
तब टूटते सपनों की आवाज सिर्फ तुम्हें सुनाई देगी
तब दरकते ख्वाबों की उघड़ी परतें सिर्फ तुम्हें दिखाई देंगी
उस वक्त अपनी रेस में अकेले ही दौड़ोगे
फिर भी हार जाने के खौफ से जूझते रहोगे
खुद से सवाल पूछोगे, खुद को जवाब देते रहोगे
दिल को तसल्ली दोगे
मगर समझा नहीं पाओगे
जब तुम मेरी उमर के हो जाओगे
तब ये बात समझ पाओगे
कि विद्रोही तेवर कैसे ठंडे पड़ जाते हैं
मेरे जैसे लोग भी दायरे में सिमट जाते हैं
तब पता चलेगा कि जो उलझा हुआ धागा
मुझे विरासत में मिला था
उसे सुलझाने में कैसे उम्र बीत गई
कभी अक्ल लगाई, कभी जोर लगाया
पर उसमें गांठ लगने से रोक नहीं पाया
वो धागा कहीं टूट न जाए
इस डर से हर वक्त खुद को घिरा पाओगे
जब तुम मेरी उमर के हो जाओगे
तब ये बात समझ पाओगे
कि जिम्मेदारियां कैसे जंजीर बन जाती हैं
कि एक मुकम्मल जमीन क्यों नहीं मिल पाती है
जब तुम मेरी उमर के हो जाओगे
तब ये बात समझ पाओगे
जब तुम मेरी उमर के हो जाओगे
तब ये बात समझ पाओगे
02 November, 2011
14 December, 2010
एक फरिश्ता
एक फरिश्ते की नकल कर रहा था मैं
बड़ी गहरी चोट खाई
वो फरिश्ता, जो किताबों में रहता है
मां की कहानियों में पलता है
पिता के आदर्शों में बढ़ता है
लेकिन दुनिया में उसका कोई वजूद नहीं
ये बात बहुत देर से समझ में आई
एक फरिश्ते की नकल कर रहा था मैं
बड़ी गहरी चोट खाई
वो कहता रहा, मैं सुनता रहा
उसके बताए रास्तों पर चलता रहा
अब पांव में सिर्फ छाले ही छाले हैं
हर तरफ मुश्किलों के जाले हैं
ये आफत भला क्यों मेरे मन को भायी
एक फरिश्ते की नकल कर रहा था मैं
बड़ी गहरी चोट खाई
कुछ उल्टी रीत है उसकी
कहता है सब्र कर, सब मिलेगा
लगे रहो, आगे बढ़ेगा
अब देखता हूं कि पीछे रह गया मैं
न उसे दुनियादारी आती है, न उसने मुझे सिखाई
एक फरिश्ते की नकल कर रहा था मैं
बड़ी गहरी चोट खाई
एक दिन मैं यूं ही उदास बैठा था
मन उलझनों के भंवर में लिपटा था
तब वो फरिश्ता मेरे पास आया
मुझे देखा और मुस्कुराया
फिर उसने धीरे से मेरे कान में वो तारीख बताई
एक फरिश्ते की नकल कर रहा हूं मैं
एक रोज मेरी भी होगी सुनवाई
एक फरिश्ते की नकल कर रहा हूं मैं
उस रोज मेरी भी होगी सुनवाई
बड़ी गहरी चोट खाई
वो फरिश्ता, जो किताबों में रहता है
मां की कहानियों में पलता है
पिता के आदर्शों में बढ़ता है
लेकिन दुनिया में उसका कोई वजूद नहीं
ये बात बहुत देर से समझ में आई
एक फरिश्ते की नकल कर रहा था मैं
बड़ी गहरी चोट खाई
वो कहता रहा, मैं सुनता रहा
उसके बताए रास्तों पर चलता रहा
अब पांव में सिर्फ छाले ही छाले हैं
हर तरफ मुश्किलों के जाले हैं
ये आफत भला क्यों मेरे मन को भायी
एक फरिश्ते की नकल कर रहा था मैं
बड़ी गहरी चोट खाई
कुछ उल्टी रीत है उसकी
कहता है सब्र कर, सब मिलेगा
लगे रहो, आगे बढ़ेगा
अब देखता हूं कि पीछे रह गया मैं
न उसे दुनियादारी आती है, न उसने मुझे सिखाई
एक फरिश्ते की नकल कर रहा था मैं
बड़ी गहरी चोट खाई
एक दिन मैं यूं ही उदास बैठा था
मन उलझनों के भंवर में लिपटा था
तब वो फरिश्ता मेरे पास आया
मुझे देखा और मुस्कुराया
फिर उसने धीरे से मेरे कान में वो तारीख बताई
एक फरिश्ते की नकल कर रहा हूं मैं
एक रोज मेरी भी होगी सुनवाई
एक फरिश्ते की नकल कर रहा हूं मैं
उस रोज मेरी भी होगी सुनवाई
01 December, 2010
खुश रहने की दवा
आजकल खुश रहने की दवा खा रहा हूं
और असर दिखने लगा है
बस चंद रोज पहले से
बदल गया है सबकुछ
अब मैं ज्यादा नहीं सोचता
मन में कोई अपराधबोध नहीं रखता
भूल चुका हूं कल की बातें
कल का कोई हिसाब नहीं रखता
आजकल खुश रहने की दवा खा रहा हूं
और असर दिखने लगा है
जो चल रहा है, सब ठीक है
अब कहां कोई गम है
हर रोज हंस रहा हूं
यही क्या कम है
कुछ पाने की जल्दी में
अब बिल्कुल नहीं रहता
आजकल बेफिक्र होने की दवा खा रहा हूं
और असर दिखने लगा है
पहले उठते थे मन में ढेरो सवाल
पीछे पड़ जाते थे अनचाहे ख्याल
हर शख्स को अपनी तराजू पर तौलना
सही-गलत को हर वक्त टटोलना
अब जो बोझ मिले वो कम है
हर बोझ मैं सिर पर नहीं रखता
आजकल तनाव सहने की दवा खा रहा हूं
और असर दिखने लगा है
बड़ा कमजोर दिल था मेरा
साथ छूटने के डर से घबराता था
कहीं कुछ बिगड़ न जाए
इस डर से खुद को बचाता था
पहले सबकुछ जानते थे मेरे दोस्त
लेकिन खुद के बारे में अब ज्यादा नहीं बोलता
आजकल भावुक न होने की दवा खा रहा हूं
और असर दिखने लगा है
क्यों सोचना क्या किया मैंने
क्यों पूछना क्या खो दिया मैंने
अभी तो दूर बहुत चलना है
इसलिए हर वक्त खुश रहना है
अब जो उम्मीदें हैं वो खुद से हैं
इसलिए मन बेचैन नहीं रहता
आजकल खुश रहने की दवा खा रहा हूं
और असर दिखने लगा है
और असर दिखने लगा है
बस चंद रोज पहले से
बदल गया है सबकुछ
अब मैं ज्यादा नहीं सोचता
मन में कोई अपराधबोध नहीं रखता
भूल चुका हूं कल की बातें
कल का कोई हिसाब नहीं रखता
आजकल खुश रहने की दवा खा रहा हूं
और असर दिखने लगा है
जो चल रहा है, सब ठीक है
अब कहां कोई गम है
हर रोज हंस रहा हूं
यही क्या कम है
कुछ पाने की जल्दी में
अब बिल्कुल नहीं रहता
आजकल बेफिक्र होने की दवा खा रहा हूं
और असर दिखने लगा है
पहले उठते थे मन में ढेरो सवाल
पीछे पड़ जाते थे अनचाहे ख्याल
हर शख्स को अपनी तराजू पर तौलना
सही-गलत को हर वक्त टटोलना
अब जो बोझ मिले वो कम है
हर बोझ मैं सिर पर नहीं रखता
आजकल तनाव सहने की दवा खा रहा हूं
और असर दिखने लगा है
बड़ा कमजोर दिल था मेरा
साथ छूटने के डर से घबराता था
कहीं कुछ बिगड़ न जाए
इस डर से खुद को बचाता था
पहले सबकुछ जानते थे मेरे दोस्त
लेकिन खुद के बारे में अब ज्यादा नहीं बोलता
आजकल भावुक न होने की दवा खा रहा हूं
और असर दिखने लगा है
क्यों सोचना क्या किया मैंने
क्यों पूछना क्या खो दिया मैंने
अभी तो दूर बहुत चलना है
इसलिए हर वक्त खुश रहना है
अब जो उम्मीदें हैं वो खुद से हैं
इसलिए मन बेचैन नहीं रहता
आजकल खुश रहने की दवा खा रहा हूं
और असर दिखने लगा है
24 October, 2007
खास...
कभी बैठो मेरे पास
और बताओ
कैसा लगता है
आम से खास बन जाना
कैसे बदलती है लोगों की राय
कैसे बदलता है उनका नजरिया
उनकी आंखों में जो दिखता है फर्क
चेहरे की कैसे बदलती है भाषा
मुझे बताओ
कैसा लगता है
लाखों दिलों की आस बन जाना
कैसा लगता है
आम से खास बन जाना
क्या होता है जब कोई अजनबी
तु्म्हें देख चहक उठता है
क्या होता है जब बढ़ते हैं कई हाथ
तुमसे मिलने को बेताब
तुम्हें छूने को बेताब
उनकी मुस्कान में तुम्हें क्या नजर आता है
क्या तुम्हें भी कुछ खो देने का डर सताता है
मुझे बताओ
कैसा लगता है
हारी बाजी का आखिरी प्रयास बन जाना
कैसा लगता है
आम से खास बन जाना
तू मेरे दोस्त
मेरे जैसा ही तो था
साथ तय की थीं
हमने कई-कई मंजिलें
बुरे वक्त में
हमने बांटी थी रोटी
साथ चिल्लाकर कहते थे
बस छू लेनी है चोटी
तब हम दोनों के ख्वाब ऊंचे थे
कई सपने हमने साथ-साथ बुने थे
लेकिन न जाने क्यों इस दौड़ में
मैं पीछे छूट गया
साथ चले थे मगर
तेरा साथ छूट गया
लेकिन अब भी मैं तेरे लिए
हर वक्त दुआ करता हूं
तू मेरा दोस्त है
सबसे कहता रहता हूं
अब तो दिल में बस एक ही एहसास है
मैं उसके लिए खास हूं
जो सबके लिए खास है
मैं उसके लिए खास हूं
जो सबके लिए खास है
और बताओ
कैसा लगता है
आम से खास बन जाना
कैसे बदलती है लोगों की राय
कैसे बदलता है उनका नजरिया
उनकी आंखों में जो दिखता है फर्क
चेहरे की कैसे बदलती है भाषा
मुझे बताओ
कैसा लगता है
लाखों दिलों की आस बन जाना
कैसा लगता है
आम से खास बन जाना
क्या होता है जब कोई अजनबी
तु्म्हें देख चहक उठता है
क्या होता है जब बढ़ते हैं कई हाथ
तुमसे मिलने को बेताब
तुम्हें छूने को बेताब
उनकी मुस्कान में तुम्हें क्या नजर आता है
क्या तुम्हें भी कुछ खो देने का डर सताता है
मुझे बताओ
कैसा लगता है
हारी बाजी का आखिरी प्रयास बन जाना
कैसा लगता है
आम से खास बन जाना
तू मेरे दोस्त
मेरे जैसा ही तो था
साथ तय की थीं
हमने कई-कई मंजिलें
बुरे वक्त में
हमने बांटी थी रोटी
साथ चिल्लाकर कहते थे
बस छू लेनी है चोटी
तब हम दोनों के ख्वाब ऊंचे थे
कई सपने हमने साथ-साथ बुने थे
लेकिन न जाने क्यों इस दौड़ में
मैं पीछे छूट गया
साथ चले थे मगर
तेरा साथ छूट गया
लेकिन अब भी मैं तेरे लिए
हर वक्त दुआ करता हूं
तू मेरा दोस्त है
सबसे कहता रहता हूं
अब तो दिल में बस एक ही एहसास है
मैं उसके लिए खास हूं
जो सबके लिए खास है
मैं उसके लिए खास हूं
जो सबके लिए खास है
06 July, 2007
आज क्यों है उदास?
सुबह से मैं बस यूं ही उदास था
खुद से पूछा क्या है वजह
खुद में ढूंढा क्या है कमी
क्या कुछ छूटा है अपना
या कोई रूठा है अपना
सबकुछ तो ठीक था
फिर ये कैसा एहसास था
सुबह से मैं बस यूं ही उदास था
आज चेहरे पर क्यों छाई रही खामोशी
खुशी की कोई आहट नहीं है
नहीं! मेरी कोई चाहत नहीं है
ऐसे रहने की आदत नहीं है
फिर क्यों कमजोर मेरा विश्वास था
सुबह से मैं बस यूं ही उदास था
खुद से पूछा क्या है वजह
खुद में ढूंढा क्या है कमी
क्या कुछ छूटा है अपना
या कोई रूठा है अपना
सबकुछ तो ठीक था
फिर ये कैसा एहसास था
सुबह से मैं बस यूं ही उदास था
आज चेहरे पर क्यों छाई रही खामोशी
खुशी की कोई आहट नहीं है
नहीं! मेरी कोई चाहत नहीं है
ऐसे रहने की आदत नहीं है
फिर क्यों कमजोर मेरा विश्वास था
सुबह से मैं बस यूं ही उदास था
29 June, 2007
बड़े बे-आबरू हुए हम
अपने ही घर के दरवाजे पर
बड़े बे-आबरू हुए हम
यूं ही खड़े रहे दर पर
मगर किसको मेरी फिकर
लोग आते रहे जाते रहे
मेरी ओर देख मुस्कुराते रहे
हर नजर मुझसे कहती रही
अजनबी हो चुके हैं तेरे कदम
बड़े बे-आबरू हुए हम
जहां कभी हम चहकते थे
दिल खोलकर हंसते थे
घंटों बातें होती थीं
बेझिझक मुलाकातें होती थीं
वो जगह इतनी परायी हो गई
इक सांस लेने में निकलता है दम
बड़े बे-आबरू हुए हम
मैंने तो बस एक ख्वाब देखा था
उसे सच करने की हिम्मत जुटाई थी
इसीलिए तो घर से निकला था
आपने दिल में रख लिए
सारे गम
बड़े बे-आबरू हुए हम
अपने ही घर के दरवाजे पर
बड़े बे-आबरू हुए हम
बड़े बे-आबरू हुए हम
यूं ही खड़े रहे दर पर
मगर किसको मेरी फिकर
लोग आते रहे जाते रहे
मेरी ओर देख मुस्कुराते रहे
हर नजर मुझसे कहती रही
अजनबी हो चुके हैं तेरे कदम
बड़े बे-आबरू हुए हम
जहां कभी हम चहकते थे
दिल खोलकर हंसते थे
घंटों बातें होती थीं
बेझिझक मुलाकातें होती थीं
वो जगह इतनी परायी हो गई
इक सांस लेने में निकलता है दम
बड़े बे-आबरू हुए हम
मैंने तो बस एक ख्वाब देखा था
उसे सच करने की हिम्मत जुटाई थी
इसीलिए तो घर से निकला था
आपने दिल में रख लिए
सारे गम
बड़े बे-आबरू हुए हम
अपने ही घर के दरवाजे पर
बड़े बे-आबरू हुए हम
13 June, 2007
तेरी याद आती है
मुंबई क्यों तेरी याद आती है
तेरे पास क्या छूट गया है मेरा
क्यों तेरी याद आती है...
समंदर की लहरों में मुझे
कुछ खास नजर नहीं आया
फिर आज क्यों उन्हें
छूने का दिल करता है
तेरे किनारों पर कभी दिल नहीं लगा
फिर आज क्यों वहीं
शाम बिताने का दिल करता है
वो लहरें मुझे हर रोज बुलाती हैं
मुंबई क्यों तेरी याद आती है...
वो भीड़, वो ट्रेन, वो भागदौड़
सब छोड़ कर तो आया था
अच्छे खाने की सोचकर
दिल्ली चला आया था
फिर क्यों वड़ा पाव के लिए
जीभ ललचाती है
मुंबई क्यों तेरी याद आती है...
जब तक रहा तेरी गोद में
भागने को रहा बेताब
लेकिन कांदिवली की वो गलियां
क्यों आज मन को सुहाती हैं
मुंबई क्यों तेरी याद आती है...
फ्लैट नंबर A-106, अनिता विहार
लोखंडवाला, कांदिवली (ईस्ट)
ऐसा घर शायद कभी न मिले
लेकिन मुझे किसकी तलाश है
उस घर की, उस गली की, उस आबोहवा की
या फिर मुंबई की...
क्योंकि वो घर, गली, आबोहवा
कहीं और नहीं मिलेगी
क्योंकि दुनिया में दूसरी मुंबई
है ही नहीं
इसीलिए मुंबई हर रोज
तेरी याद आती है
तेरे पास क्या छूट गया है मेरा
क्यों तेरी याद आती है...
समंदर की लहरों में मुझे
कुछ खास नजर नहीं आया
फिर आज क्यों उन्हें
छूने का दिल करता है
तेरे किनारों पर कभी दिल नहीं लगा
फिर आज क्यों वहीं
शाम बिताने का दिल करता है
वो लहरें मुझे हर रोज बुलाती हैं
मुंबई क्यों तेरी याद आती है...
वो भीड़, वो ट्रेन, वो भागदौड़
सब छोड़ कर तो आया था
अच्छे खाने की सोचकर
दिल्ली चला आया था
फिर क्यों वड़ा पाव के लिए
जीभ ललचाती है
मुंबई क्यों तेरी याद आती है...
जब तक रहा तेरी गोद में
भागने को रहा बेताब
लेकिन कांदिवली की वो गलियां
क्यों आज मन को सुहाती हैं
मुंबई क्यों तेरी याद आती है...
फ्लैट नंबर A-106, अनिता विहार
लोखंडवाला, कांदिवली (ईस्ट)
ऐसा घर शायद कभी न मिले
लेकिन मुझे किसकी तलाश है
उस घर की, उस गली की, उस आबोहवा की
या फिर मुंबई की...
क्योंकि वो घर, गली, आबोहवा
कहीं और नहीं मिलेगी
क्योंकि दुनिया में दूसरी मुंबई
है ही नहीं
इसीलिए मुंबई हर रोज
तेरी याद आती है
07 June, 2007
हारने का एहसास
हारने का एहसास ही बहुत तकलीफ देता है...
रोज उठना, तैयार होना, ऑफिस जाना...
और एक-एक दिन गिनना छुट्टी के लिए...
क्योंकि उस दिन दोस्तों से मुलाकात होगी
रुके हुए काम पूरे हो जाएंगे
और छुट्टी के दिन...
देर तक सोते हैं
बिना वजह टीवी देखते हैं
फिर शाम की राह देखते हैं
और फिर किसी मॉल में जाकर
कोई फिल्म देख लेते हैं
एक और छुट्टी निकल गई
ना दोस्तों से मुलाकात हुई
ना कोई काम हुआ...
शहर बड़ा है... दूरी भी बड़ी है
मिलने के लिए सोचना पड़ता है
दोस्त दूर हो रहे हैं
और यही हारने का एहसास रोज होता है
दिल ढूंढता है फुर्सत के रात-दिन
रोज उठना, तैयार होना, ऑफिस जाना...
और एक-एक दिन गिनना छुट्टी के लिए...
क्योंकि उस दिन दोस्तों से मुलाकात होगी
रुके हुए काम पूरे हो जाएंगे
और छुट्टी के दिन...
देर तक सोते हैं
बिना वजह टीवी देखते हैं
फिर शाम की राह देखते हैं
और फिर किसी मॉल में जाकर
कोई फिल्म देख लेते हैं
एक और छुट्टी निकल गई
ना दोस्तों से मुलाकात हुई
ना कोई काम हुआ...
शहर बड़ा है... दूरी भी बड़ी है
मिलने के लिए सोचना पड़ता है
दोस्त दूर हो रहे हैं
और यही हारने का एहसास रोज होता है
दिल ढूंढता है फुर्सत के रात-दिन
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